8th Jul, 2026
बिना मरे, मरे होने की कल्पना करने को कुछ लोग 'मारबिडिटी' ही मानते हैं. लेकिन लेखक हर एक पात्र के साथ मरता और जीता है, क्योंकि मैंने लेखक की नियति स्वीकार की है इसलिए मर-मरकर जीना ही मेरा धर्म है. मरना अपने आप में कम भयावह चीज नहीं. मौत और जिंदगी वैसे तो मैरी गो राउंड की तरह है. मरने के बाद जानकार आदमी के लिए बीती जिंदगी के सुख-दुख जरूर हेरवा यानी नास्ट्रेलजिया पैदा करते होंगे. यह मैं अब अनुभव कर रहा हूं. मुझे मारने वाला इसी पत्रिका का संपादक है. मैंने कब चाहा था मरना. पर इसने मुझे इसलिए मरने के लिए मजबूर कर दिया कि मैं लेखक हूं. मरने के बाद जिंदगी की कथा अपनी पत्रिका में छापना चाहता था. आप जानते हैं मेरे मरने की कल्पना से ही मेरे घर वाले और मित्र कितना नाराज होंगे. किसी और को कहा होता कि तुम मरकर बताओ कैसा लगता है तो हो सकता था वह पहले संपादक जी से कहता कि मारे मैं देता हूं, बताओ तुम. पर बेचारा लेखक ! खैर, यह मान लीजिये कि मैं मर गया! संपादक ने मुझे प्लानचेट(Planchat) पर बुलाया - अब देखिये ज्यादती. एक तो मरने के लिए मजबूर किया और जब मर गया तो जिंदा रहते मरने के लिए अभिशप्त उसलागर आत्मा को भी चैन से नहीं बैठने दिया. संपादकों को भी माशूकों की तरह जाने क्या-क्या शौक होते हैं- वे इस बात पर मचले हैं कि जख्मे जिगर देखेंगे. और इनकी अदा देखिये कि हमारे मरने और मरने के बाद आंखों देखा हाल सुनने के लिए बजिद हैं. आपको पता है प्लानचेट पर आने के बाद आत्मा उसी तरह उसके कब्जे में होती है जैसे एक लेखक कलम और कागज उठा लेने के बाद उनके कब्जे में न लिखे तो पछताए और लिखे तो पछताए. ऐसे क्यों लिखा, ऐसे क्यों नहीं लिखा.
हां तो गिरिराज किशोर मर गया. मान लीजिये. अच्छा हुआ बात-बेबात लिखता ही रहता था. जैसे छेरा लग गया हो. जान छूटी. संपादकों तक की नाक में दम था. पाठक तो वर्का पलटकर बच जाते थे पर छूटी कहां जान, मरने के बाद भी अपनी मौत का हाल लिख भेजा. ऐसे लेखकों से खुदा बचाए, हिंदुस्तान में है कोई लेखक जो साहित्य लिखने के लिए और साहित्य से संबंधी इतने तामझाम के साथ नौकरी कर रहा हो और पांच अंकों में तनख्वाह पाकर दीनहीन हो. लिखता क्या है. न उर्दू जाने, न हिंदी. चलो अच्छा हुआ. जल्दी अस्ताचल को चला गया. भारतभूषण अग्रवाल कहा करते थे साहित्यिक दृष्टि से तुम्हारा नाम किसी काम का नहीं. नाम में कुछ चमत्कार होना चाहिए. नाम का क्या किया जाए. नाम और बीवी रोज-रोज नहीं बदले जाते जो बदल लेते हैं उनकी क्या बातों में गिरिराज किशोर जो मर चुका प्लैंचेट पर संपादक जी के कब्जे में पूछे गये सवालों का जवाब देने के लिए बाध्य है-संपादक पूछ रहा है यहां से कहां गये थे वहां हो वहां खुश हो? क्या करते हो? अब ये भी कोई सवाल हुए बिल्कुल जनेलिस्टिक सवाल?
फिर तुम्हें क्या लेना हम दुखी हैं तो अपने लिए, खुश हैं तो अपने लिए. तुम संपादक क्या हो गये तीनों जहान का जिम्मा ले लिया. खैर जवाब तो देना ही था. हालांकि दिल कांप रहा था. कहते हैं कई बार आत्मा बीच में फंस जाती है. यहां की भी नहीं रहती और वहां की भी नहीं रहती, मुझे कहना पड़ा देखो, तुम भले ही दलितों के अलम्बरदार बने घूमते हो. अगर तुम यह जान जाओगे कि मरने के बाद मेरा क्या हुआ तो 'धत्त तेरी की' कहते नजर आओगे. आदमी चाहे किसी भी वर्ग का हो अपने से हीन से नफरत करने से बाज नहीं आता. साधु-संत तक नहीं. जब थोड़ा उबरोगे तो यही कहोगे कि तेरा यही होना था. बताओ तो सही? बताना पड़ा- मैं चूहा हूं. निरामिष चूहा. मेरा संपादक दोस्त वाकई चकरा गया! चूहा? मजाक मत कर! जिंदगी भर तो असलियतों को मजाक मानते रहे- अब तो कम से कम असलियत को असलियत मानने की आदत डालो. दूसरे सवाल का जवाब भी सीधा-साधा था. ऊपर वाले की बड़ी मेहरबानी है. चूहा तो जरूर बनाया पर उसी परिवेश में भेज दिया जिसमें मैं पिछले बीस सालों से रह रहा था. वही घर, वही कमरा, वही मेज, वही किताबों की अलमारियां और कोने में मेरा एक छोटा-सा बिल. उसमें चंद दाने-गेहूं, बाजरा, दाल वगैरह वगैरह. कभी-कभी मिठाई भी हाथ लग जाती है और कड़वा भी. जितना छोटा मैं जीवित रहता था, उतना ही छोटा अब भी हूं. बस फर्क इतना ही है तब मुझे मेरे दोस्त-अहबाब पहचानते थे कि यह गिरिराज किशोर है. अब उन्हें पता ही नहीं मैं कौन हूं. कहां से आया? जब कभी अपनी उस कुर्सी पर, जिस पर बैठकर लिखा करता था, बैठ जाता हूं और लेखक होने का अहसास अपने अंदर भरने की कोशिश करता हूं, अगर अचानक किसी की नजर पड़ जाती है तो तूफान मच जाता है-घर में चूहा घुस आया. जैसे मैं चूहा न होकर शेर होऊं. किताबें काट डालेगा. उन्हें कैसे बताऊं कि मैं निरामिष हूं. कागज-किताबें ही चूहों का सामिष भोजन होता है. उन्हें पुनर्जीवित या पुनर्निर्मित नहीं किया जा सकता. उन्हें मैं कभी नहीं खाता, निरामिष होने की भी एक अलग दास्तान है, मौका मिला तो सुनाऊंगा. अभी तो संपादक द्वारा पूछे गए सवालों के जवाब सुनें. जहां तक खुश होने की बात है. जब अपना यह संसार चूहे की नजर से देखता हूं तो तबियत मसोसकर रह जाता हूं, मेरे लोग, मेरी किताबें, मेरी पांडुलिपियां अब मेरा कुछ भी नहीं. मैं भले ही इन्हें अपना कहूं पर चीज अपनी तभी होती है जब समाज उस पर स्वामित्व स्वीकार करे.
एक चूहे का क्या स्वामित्व, जहां तक कुछ करने का सवाल है यही एक सिल्वर लाइन है, अपने लोगों के बीच बने रहकर, अपने किये हुए को एक दूसरी योनि में जीना. कभी-कभी लोग आते हैं, कमरे में झांकते हैं, मेरे परिवार वालों से मेरे बारे में पूछते हैं. परिवार वाले मेरी याद से विह्वल होकर ऐसी-ऐसी घटनाएं सुनाते हैं जिनकी मुझे तक याद नहीं. सुनने वालों के चेहरों पर एक तरह की चमक आ जाती है. मैं किसी मेज या अलमारी के नीचे छिपा देखता रहता हूं-जब मैं खुश होता हूं तो मूंछों के बाल हिलने लगते हैं और पूंछ खड़ी हो जाती है.
मुझे याद है कि मेरा लिखना मेरे ऊपर कितना हावी रहता था. मेरे घर
वाले तक यह कहने लगे थे कि तुम्हें या तो अपने लेखन से मतलब या लेखकों से. तुम्हारे लिए दुनिया में कोई और जैसे है ही नहीं. मैं उन्हें कैसे समझाता कि सारी दुनिया ही इस लेखन में समाई है. हम सब रिश्तों को साहित्य से ही पहचानते हैं. पहले हम पहचानते नहीं थे, जीते थे. वह भी अज्ञानता के साथ. पत्नी का साथ, बच्चों का प्यार, मां-बाप का वात्सल्य, मित्रों की लाग-डाट और याराना, इन्सान का टुच्चापन और महानता-सब कुछ साहित्य में एक विस्तृत परिप्रेक्ष्य में रहता है, अपने में संपूर्ण. इसमें तुम भी हो, मैं भी हूं-जाने-अनजाने, प्यारे-प्यारे सभी हैं-यहां तक वह ईश्वर भी है जो अपने में सब कुछ है और कुछ भी नहीं. यह नहीं कि उस लेखन का मजा मैं अब नहीं लेता. जब मैं मूंछों के दो जोड़ी बाल हिलाता हुआ, पूंछ फटकारता हुआ कुर्सी पर आकर बैठता हूं तो मेरे उपन्यासों के सारे पात्र आ उपस्थित होते हैं. तीसरी सत्ता, चिड़ियाघर, जुगलबंदी, परिशिष्ट, यथा प्रस्तावित, दावेदार, असलाह, इंद्र सुनें, ढाई घर-सव ये उपन्यास, मैंने इसी घर, इसी मेज पर लिखे थे. अब मैं लिख नहीं सकता पर उन्हें जी तो सकता हूं. तुम कहोगे यह तो बड़ा करामाती चूहा है. सच तो यह है कि मैं यह अपने अनुभव से कह रहा हूं. कि लेखक किसी भी योनि में क्यों न पहुंच जाए वह अपने पात्रों को नहीं भूलता. उन्हें रह-रहकर किसी न किसी रूप में पुनः पुनः जीता है. आप फिर हंस रहे हैं कि मैं चूहा होकर कैसी यूटोपियन बात कर रहा हूं. लेखन जितनी अनुभव की बात है उतनी ही आस्था की बात है. आस्था, जन्म-जन्मांतर की चीज है. रचनायें उसी तरह लख्ते जिगर हैं जैसे जया, शिवा, अनीश मीरा ! और मेरे सब हमदम.
सुना है मरने के बाद आत्मा तेरह दिन तक अगुंष्टवत भुनगे की तरह चक्कर काटती रहती है. बाद में भी वक्तन-बवक्तन अपने बच्चों, अपने घर वालों को देखने आती है. दोस्तों की भी खबर-सार रखती है. यह तो मेरी खुशकिस्मती है कि मुझे चूहा बनाकर भेजा ही यहां गया. इसी घर में मैंने और परिवार ने घोर मुसीबत के दिन काटे थे. आकाओं की नाराजगी का कहर भी हमने इसी घर की छत के नीचे रहकर झेला था. अगर मैं लेखक न हुआ होता तो शायद पागल हो जाता या आत्महत्या कर लेता. छोटे-छोटे बच्चे थे. दस ही वर्ष शादी को हुए थे. खेलने-खाने के दिन थे. तब मुझे लगा लेखक होना अपने आप में कितनी बड़ी गुंजाइश है. लेखक बनाने का जिम्मा सत्या जीजी पर है. जमींदारों का घर, वहां तो दबदबा, रऊनत, हुक्मानुगमन-लेखन से उनका क्या मतलब. सत्या जीजी ने मुझे इलाहाबाद की जमीन में ले जाकर धान की तरह रोपा था. उस मिट्टी ने मेरे अंदर लेखन के तत्व भर दिये. वरना तो मैं पता नहीं क्या हो गया होता. इलाहाबाद का कॉफी हाउस और उसके बराबर में 13 महात्मा गांधी मार्ग वाले बंगले का एक हिस्सा. बस शाम के चार बजे से काफी मिश्रित साहित्यिक गंध आनी शुरू हो जाती थी-एक पुकार की तरह. आओ-आओ हम सब इकट्ठे हैं. चूहा योग में भी मैं लेखक होने के उस एहसास को नहीं भुला पाता. लेखक होने का अहसास मुझे तब भी था जब मेरी पेशी धर्मराज के सामने हुई.
धर्मराज ने कोने में दुबके खड़े देखकर पूछा यह कौन है तो चित्रगुप्त ने बहीखाता खोलकर कहा, "महाराज, है तो यह मनुष्य पर अपने को लेखक मानता है."
मुझे याद है कि धर्मराज हंसे थे. बोले, "मैं तुम्हारी बात नहीं समझा."
"क्षमा करें महाराज, यह लेखक कैसे हो सकता है. जिंदगी भर नौकरी की. बिना पढ़ाए प्रोफेसर की तनख्वाह पाता रहा. लेखक तो निराला थे, बिटिया को दवा तक नहीं मिली-अर्धविक्षिप्त अवस्था में जीते और कविता करते रहे."
"तुम्हें मालूम नहीं इन्सान के लिए लेखक होना जरूरी नहीं पर लेखक के लिए इन्सान होना जरूरी है. तुम्हारे पास लेखक न मानने का क्या कारण है?"
"बही खाते में यह तो लिखा है कि इसने उपन्यास, कहानी, नाटक, लेख-सब कुछ लिखा. पर न तो इसे साहित्य एकेडेमी का वह सरकारी पुरस्कार मिला जो दूसरी भाषाओं के लेखकों को कलम पकड़ना सीखते ही मिल जाता है-ज्ञानपीठ, नोबेल पुरस्कार, या बिरला जी के पुरस्कार की तो बात ही क्या करनी. उत्तर प्रदेश का पुरस्कार तक नहीं मिला जो कुंवर चन्द्र प्रकाश सिंह तक को मिल गया. उसे भी छोड़िये दूसरे नंबर के उस पुरस्कार तक इसकी रसाई नहीं हुई, जो 1991 में हलवे की तरह बांटा गया था. बिना लौ का दीया और बिना पुरस्कार का लेखक एंवे ही होते हैं. बहीखाते में यह भी लिखा है कि एक उपन्यास पाठ्यक्रम में लगा दिया गया था. उसका सारा इलजाम पाठ्यक्रम समिति की संयोजिका पर आया सो अलग, अपने को आलोचक, उपन्यासकार, कवि कहने वाले एक कुलपति ने अपने विशेषाधिकार का प्रयोग करके उसे कोर्स तक से हटा दिया. कुलपति को ग्राम्य शब्दों के प्रयोग से परहेज था, ग्राम्य कामों से नहीं. यही नहीं भारत सरकार ने दुनिया भर के लोगों को पद्म उपाधियां बांटी-इससे पूछिये इसे कभी कुछ मिला. अगर हम अपने रिकॉर्ड में इसके लेखक होने का इंदराज कर लें तो इसे सरकारी तौर पर लेखक होने की स्वीकृति मिल जायेगी. लेखक होने के सारे लाभ इसे देने होंगे. यहां तक कि इसे दोबारा मारकर एक लेखक के मरने का तामझाम करना होगा और इसकी शव यात्रा को दूरदर्शन पर दिखाना होगा. कुछ मरणोपरांत पुरस्कारों का प्रबंध भी करना होगा."
धर्मराज चित्रगुप्त की बात सुनकर चक्कर में पड़ गये थे. फिर हंसकर बोले, "पद्म सम्मान तो गांधी जी तक को नहीं मिला. जबकि अब वही पद्म सम्मान मरणोपरांत छांट-छांटकर लोगों को दिया जा रहा है. गांधी जी उसमें भी नहीं. निराला तक बिना एकेडेमी पुरस्कार के सिधार गये तो क्या निराला लेखक और कवि नहीं थे. लगता है तुमने उन सब बलिदानियों के नाम के आगे भी यही लिखा होगा-जो अपने को देशभक्त मानते थे-जिनको कोई जीवनोपरांत इनाम या सम्मान नहीं मिला." चित्रगुप्त बगलें झांकने लगे.
गये?" धर्मराज की नजर एकाएक मेरे ऊपर पड़ी बोले, "तुम अभी से क्यों मर
मुझे हंसी आ गयी. वे भवें चढ़ाकर बोले, “हंसते क्यों हो?"
"महाराज जिस सवाल का जवाब आपके कार्यालय में होना चाहिए-उस सवाल का जवाब आप मुझसे पूछ रहे हैं? अगर इस सवाल का जवाब मुझे ही देना है तो मैं कहूंगा आप मेरे मित्र और हंस के संपादक राजेन्द्र यादव से पूछिये. उसे अपनी पत्रिका में मरणोपरांत आंखों देखा हाल छापने के लिए अंक वार एक लेखक चाहिए- इस बार उसने मुझे पकड़ लिया. मैंने बहुत शर्तें लगायीं-बहुत बचना चाहा. पर नहीं बच पाया. मरने के लिए एक पैसा तक नहीं दिया. हंस तक किराया मेरे घरवालों को देना पड़ा. लेकिन महाराज यह तो मेरा स्पष्टीकरण हुआ, आपका भी तो कोई स्पष्टीकरण होगा."
वे बोले, "तुम इतना लिखते थे कि तुम्हारे ऊपर तुम्हारे लेखक मित्रों और संपादकों की हाय पड़ी. जितना लिखते गये उतनी तुम्हारी उम्र कम होती गयी. कट-कटकर पचपन साल सात महीने रह गयी-फरवरी खत्म होते-होते तुम यहां आ गये. तब और भी संकट हो जाता है जब किसी लेखक के समकालीन उसे लेखक मानने से इंकार कर दें. तुम्हारे कई समकालीनों ने लिखकर तुम्हारी गैरहुर्मती की. फिर तुम्हें लम्बी उम्र कैसे देते."
"लिखा तो टालस्टाय, प्रेमचंद, यशपाल ने भी बहुत है. बहुत-से लेखक हुए हैं जिनके समकालीन उन्हें ठेंगे पर रखते थे. बताइए कबीर का किसी ने जिक्र किया?"
"वह जमाना जलने वालों का नहीं था-तब बेपढ़े भी आज के पढ़ों से बेहतर होते थे. समाज की रुचियों के साथ-साथ स्वर्ग के नियम भी बदलते जाते हैं."
"अब बताइये मुझे क्या करना है, कहां जाना है?"
"तुम क्या चाहते हो?"
हैं." "मैं तो फिर से लेखक बनना चाहता हूं-मेरे बहुत से संकल्प अभी अधूरे
"जैसे?"
गांधी पर उपन्यास लिखना."
"वह तो तुम नहीं बन सकते. तुम्हारे लेखक बंधु, पाठक तुम्हारे नाम पर इतनी बद्दुआएं दे चुके हैं कि मैं चाहते हुए भी तुम्हें दीनहीन योनि से नहीं बचा सकता.'' सोचकर बोले, "एक काम कर सकता हूं कि तुम्हें चूहा बना दूं."
"चूहा ! चूहा तो बहुत घृणित माना जाता है."
"घृणित अपने कामों से हुआ जाता है. आदमी या चूहा बनने से नहीं."
"मुझे पुस्तकें कतरनी पड़ेंगी."
"नहीं, तुम निरामिष चूहे बनोगे."
मेरे न चाहते हुए भी धर्मराज और संपादक ने मिलकर मुझे निरामिष चूहा बना दिया. दरअसल संपादक की पहुंच वहां भी थी. धर्मराज भी अपनी कहानी छपवाने के लालच में पड़ गये थे. चित्रगुप्त तो थे ही. चूहा बनने में मुझे बहुत तकलीफ हुई थी. चित्रगुप्त ने कान में धीरे-से फुसफुसाकर कहा, "तुम दुखी मत हो लेखक भी मूलतः चूहा ही होता है. चौकन्ना. चुपचाप निकलता है, सब कुछ आंखें चमका-चमकाकर देखता है और अंधेरा होते ही अपनी कल्पना-शक्ति से, वहीं पहुंच जाता है जहां उसे पहुंचना होता है. इसलिए तुम दुखी न हो, भले ही लिख न पाओ पर 'आब्जर्वेशन' की दृष्टि से तुम बड़े से बड़े लेखक से कम नहीं होगे.
जिन दिनों जगह-जगह अणुबम के विस्फोट किये जा रहे थे, उन्हीं दिनों मैंने रीडर डाइजेस्ट में एक रिपोर्ट पढ़ी थी. उस मुल्क का तो नाम याद नहीं रहा लेकिन वहां के चूहों पर विकिरण का ऐसा असर हुआ था कि सब के सब कुशाग्र बुद्धि हो गये थे. तरह-तरह के करतब करने लगे थे. उनकी बुद्धि अचानक कई गुना बढ़ गयी थी और रचनात्मक हो गयी थी. यहां तक कि वे एक-दूसरे की पूंछ पकड़ते हुए कुएं के जल तक पहुंच जाते थे और पानी की जरूरत को आदमी से पहले पूरा कर लेते थे. वे डाक्टरों की लेब में पहुंचकर दवाएं खाकर सो जाते थे. उन चूहों की बुद्धि का इतना आतंक हो गया था कि लोग डरने लगे थे. उनमें विचित्र प्रकार के कौतुक पैदा हो गये थे. वे किताबों के पास बैठकर चश्मा लगाकर वर्के पलटते थे. प्रयोगशालाओं में पहुंचकर बत्तियां जला देते थे, बटन ऑन कर देते थे. उस बात को याद करके मुझे यही लगा कि शायद आगे आने वाला जमाना आदमियों से ज्यादा चूहों का होगा. इस सबके बावजूद मुझे कोई खास प्रसन्नता महसूस नहीं हुई, बस अपने को समझा जरूर लिया. मुझे लगा मैं उस सांप की तरह हूं जो किसी जमीन में दबे हुए धन की रक्षा करता है. मैं भी अपने लिखे साहित्य की चौकीदारी कर रहा हूं.
जब पहली बार घर में मेरा साक्षात्कार किया गया तो घर भर में शोर मच गया. एक ऐसा चूहा घर आया है जो देखते-देखते अंतर्ध्यान हो जाता है. साक्षात् गणेश जी का चूहा है. मैं और डरा इतने मोटे गणेश जी, मेरे ऊपर बैठ गये तो मैं कहां जाऊंगा. कई बार ऐसा हुआ वे लोग मुझे पकड़ने के लिए दौड़े और मैं पलक मारते बिल में जा घुसा. उन लोगों को न मेरा बिल दीखता था और न मैं उस बिल में घुसता हुआ नजर आता था. वे समझते थे मैं कोई जरूर दैवी चूहा हूं. थोड़े दिन बाद उनका यह भी शक दूर हो गया था कि मैं किताबों और कागजों को काट डालूंगा. उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर यह चूहा कैसा है. धीरे-धीरे वे लापरवाह होने लगे और अलमारियां खुली छोड़कर जाने लगे. उनमें अपनी गंध तलाश करता घूमता था. मुझे उन पुस्तकों, पांडुलिपियों में अपने वे सब मित्र, साथी, सगे-संबंधी नजर आते थे जिन्हें तोड़-तोड़कर अपने अनुभवों और सामर्थ्य के अनुसार नये पात्रों में ढाला था. मुझे लगता था वे भी मुझे चूहा समझकर निर्द्धद्ध होकर बात कर रहे हैं. मैं उन्हें इस तरह जिंदा देखकर फूला न समाता था. वे मुझे देखते थे और मुस्कुराते थे. मैं जानता था वे मेरा ही अंश हैं चाहे अनुभव का हों, या संवेदना का या चेतना का.
एक दिन पता नहीं मुझे क्या हो गया मैं इतना उन्मत्त हो गया कि मैंने अपने नाम को अपनी पुस्तक पर से ही पंजों से खरोंच डाला. शायद यह चूहा होने की पीड़ा थी जिसने मुझे अपने ही नाम को अपनी ही किताब पर से खुरचने के लिए मजबूर कर दिया था. शायद हर लेखक को कभी-कभी अपने लिखे हुए से वितृष्णा होने लगती है. उस वितृष्णा का भी फल हो सकता था. मैं चूहा था इसलिए अपना पूर्ण नाम खुरच डाला. लेखक होता तो लिखने या न लिखने का कारण बताता.
उसी घटना का नतीजा था कि घर वालों ने खटके वाला चूहेदान लगा दिया. उस खटके का ताल्लुक तार से होता है और तार में रोटी का टुकड़ा-तार खिंचा और खटका बंद, यही लेखन का भी जहां लेखन रोटी का पर्याय बना वहीं खटका गिरा, एक-दो बार तो मैं चूहेदान में घुस गया था और खटके को चकमा देकर टुकड़ा लपक लाया था. पर एक दिन खटका बंद हो गया और मैं उसी में रह गया. उस दिन पहली बार मुझे अपने चूहे जीवन के प्रति मोह जगा. मैं भय से कांप गया. आलोचक से भी शायद मुझे कभी उतना डर नहीं लगा होगा जितना इस चहेदान से लगा. आलोचक से लेखक और बिल्ली से चूहा भले ही न डरे पर चूहे के लिए चूहेदान के डर से बड़ा डर नहीं होता. बाहर रहकर अपनी मुसीबतों से लड़ा जा सकता है, लेकिन बंधन में पड़ा शेर भी हो तो, मजबूर हो जाता है. मैं तो चूहा ही था.
मुझे चित्रगुप्त की वह बात याद आयी जो उसने धर्मराज के सामने मुझसे कही थी-तुमने अपनी जिम्मेदारियां निबाहीं? कितना बैंक बैलेंस छोड़ा-बस भविष्य निधि ना? तीन साल निलंबित रहे सो अलग. मुकदमे और दौड़-भाग में चालीस-पचास हजार रुपया फूंक डाला. कर्जा लेकर जमीन खरीदी कि मकान बनाओगे-वह मुकदमे की भेंट चढ़ गयी, कर्जा ज्यों का त्यों छोड़ आये-मुकदमा ऊपर से. बेटियों की शादी कर पाये ? लड़के को रोजगार से लगाया? यहां भी रोटी का टुकड़ा लपकने चले. मुझे भूख लग रही थी पर सामने कांटे में लटका टुकड़ा खाने की हिम्मत नहीं पड़ रही थी. दिल धक् धक् कर रहा था-पहली बार पता चला कि चूहों के भी दिल होता है. ढक्कन ऐसे बंद हुआ था जैसे किसी आतंकवादी ने बम फोड़ा हो. जब मैं राम को प्यारा हुआ तो आतंकवादियों का जोर था. थक के थक बेगुनाह लोग मार दिये जाते थे. उनके घरवाले रोते- बिलखते रह जाते थे. मुझे भी संपादक के आतंक के कारण ही मरना पड़ा था. मैं मरने वाले के घर वालों के दर्द को समझ सकता था. जबकि महत्वपूर्ण लोग ब्लैक कैटों से घिरे रहते थे. बस एक ही बात अच्छी थी जब नौकरानी चूहेदान ले जाने लगी तो उसे हिदायत दे दी गयी कि दूर, ऐसी जगह ले जाकर छोड़ना जहां उसे कोई मार न डाले. कहीं बिल-विल हो तो अच्छा है. बेचारा पनाह ले लेगा. मुझे हंसी आयी थी. वह मुझे खेतों में छोड़ आयी थी. उन्हीं दिनों खेत कटे थे. जैसे ही मैं चूहेदान से कूदकर भागा तो मैंने पाया कि अपने-अपने बिलों से गर्दन निकालकर और आंखें चमकाकर जंगली चूहे मुझे देख रहे हैं. यह नया बिरादर कौन है? कहां से आया है? धीरे-धीरे वे सब बाहर निकल आये-मुझे घेर लिया. मैं इन्सानों में और सजे-धजे घर में रहने वाला चूहा- मानवी प्रवृत्ति का मारा हुआ-स्वाभाविक था कि मुझे उनमें से एक तरह की ग्राम्य दुर्गंध आती महसूस हुई. वे अपने-अपने बिलों से दाने ले आये- मुझे खाने को दिये-उनमें भी वह दुर्गंध थी. मुझे उबकाई आने लगी. मैंने बावजूद भूख के, धन्यवाद देते हुए, मना कर दिया.
वे हंसे, "तो फिर क्या खाओगे? यह तो जंगल है.” मैंने हिचकिचाते हुए पूछा, "क्या तुम मेरे घर का पता बता सकते हो?"
"तुम्हारा घर कहां है?"
"507 नंबर"
वह तो नजदीक ही है, पहले हम वहीं रहते थे तब वहां खेत थे. अब वहां मकान बन गये. हममें से बहुत से उसी में मारे गये-हम जो बचे वे यहां आ गये. आदमी की माया भी निराली है, वह अपने घर के लिए तूफान बरपा कर देता है, दूसरों का घर उजाड़ने में उसे क्षण नहीं लगता. कितने खेतिहर थे-वे भी भूमिविहीन हो गये थे. हालांकि वे भी हमें मारते थे, पर ये पढ़े-लिखे लोग तो ऐसे मारते हैं कि पता नहीं चलता. गनीमत है तुम बच आये, नहीं तो मीठी गोली खिलाकर पानी पिलाकर ही मार डाला होता."
मैंने देखा वे मुझे अपने बिल में ले जाने को बेताब हैं. पता नहीं उन्हें मुझमें से बदबू आ रही थी या खुशबू. मैं बदबू से दुखी था. मेरे पास सिवाय जान बचाकर भाग खड़े होने के रास्ता ही क्या था. जंगल के वे चूहे मुझे भागते देखकर हंस पड़े.
दिमाग में पहला जन्म, अपना घर, उस घर का चूहा होने का भूत सवार था. हो सकता है धर्मराज ने चूहा बनाते समय यह दृष्टि दे दी हो कि बच्चा, जाओ तुम पहले और वर्तमान जीवन की स्मृतियों को याद रखो. यह भी हो सकता है यह शक्ति सभी चूहों के पास हो. लेकिन दूसरे चूहों के पास याद रखने को ऐसा कुछ होगा ही नहीं. वहां से भागते हुए भी अपने मरने की कल्पना कर रहा था. हो सकता है मैं दौड़ता ही दौड़ता फिर मर जाऊं या किसी मोटर या गाड़ी के पहिये के नीचे ही आ जाऊं ! मैंने कुत्तों को भी चूहों को मारते देखा था. सांपों को साबुत निगलते देखा था. मुझे अपनी पहली मौत याद आ रही थी-कैसे मेरी शव यात्रा निकली थी. मेरे घर वालों के बगैर दोस्तों के साथ-साथ मेरा वह कातिल दोस्त ज्यादा रोया था. अब चूहे की मौत मरा तो मैं बस वहीं पड़ा-पड़ा खंखड़ हो जाऊंगा, जहां मारा जाऊंगा. तब तो संस्कार भी हो गया था. हालांकि मैं अपनी उस वक्त की शव यात्रा से कतई खुश नहीं था. लेखक और राजनीतिज्ञ अपने मरने की भी एक रोमांटिक कल्पना किये रहते हैं. लोग किस तरह इकट्ठे होंगे, कैसे रोयेंगे, कैसे शोक सभाएं होंगी, कैसे लेखक मित्र लेख लिखेंगे- अखबारों में फोटो छपेंगे. जब वैसा कुछ नहीं होता तो मरना निष्फल हो जाता है.
मुझे याद है मैं मरकर भी 'स्काई लार्क' की तरह आसमान में उड़ता हुआ जमीन से जुड़ा था. मुझे लग रहा था जैसे हमारी संघर्षशील पृथ्वी, विभिन्न गंधों वाले उबलते आसवों से भरा विशाल प्याला है-जाड़े की भाप की तरह प्याले से गंधें उड़ रही हैं. उसकी समानता स्वर्ग की किसी भी गंध से करना संभव नहीं. सबसे निराली पृथ्वी की गंध है, जिसमें टालस्टाय का वार-एंड पीस बाल्मीकि की रामायण, भवभूति और होमर का काव्य, अमीर खुसरो के गीत की सुगंध मिली है. मैं उसी गंध में डूब जाना चाहता था. मेरी चेतना उसी गंध का अंश थी. मेरे सगे-संबंधी सब बहुत पीछे छूट गये थे. मैं उस सारे ब्रह्मांड में फैल गया था. जब कभी पर्यावरण साफ होता था तो मैं देखता था कि मेरी वह चेतना जो मेरी रचनाओं के रूप में नीचे रह गयी है या उन लेखकों की ऊर्जा, जिन्होंने अपने को प्रकाश में बदल लिया था. ज्योतियों की तरह तैर रही हैं. मेरे सगे-संबंधी, देश और समाज के लोग, फूलों की तरह खिले हैं. मुझे लगा अब फिर जब भी मरूंगा तो फिर उन्हें वहीं से देखूंगा और इस बार धर्मराज ने मेरी सुनी, तो हो सकता है मैं फिर उन्हीं रचनाओं के किसी पात्र में समा जाऊंगा और एक नई रचनात्मक जिंदगी की शुरुआत करूं.
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